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भारत में पहली बार हींग (Asafoetida) की खेती लाहौल घाटी में शुरू की गयी

विश्व के 40% हींग की खपत सब से ज्यादा भारत देश में ही होती है

भारत indian masale की हर किचन में हींग (Asafoetida) का उपयोग कई प्रकार के खानों को बनाने में किया जाता है| यह indian masale का एक अभिन्न हिस्सा है, यहाँ तक कि इसका उपयोग कई तरह के उपचारों में भी किया जाता है और तो और आयुर्वेद में भी इसका बहुत महत्व है| आपको पता है भले ही भारत विश्व के 40 परसेंट हींग का खपत करता है लेकिन इस बड़ी काम की चीज को भारत में नहीं उगाया जाता है| indian masale में जितना भी हींग आता है उसके लिए भारत विदेश से किये गए आयात पर निर्भर होता है| यही वजह है की भारत में इसकी कीमत बहुत ज्यादा है लेकिन अब सब कुछ बदलने वाला है क्योंकि अब पहली बार देश में हींग की खेती शुरू हो रही है|

खान-पान में उपयोग के आलावा भी हींग के कई फायदे

आपको बता दें हींग में विटामिन, कैल्शियम, आयरन, एंटी-ऑक्सीडेंट, और एंटी-वायरल गुण पाए जाते हैं| जो हमें कई बीमारियों से बचाने में मदद करते हैं|

हींग में पाये जाने वाले महत्वपूर्ण तत्व मानसिक तनाव, डिप्रेशन, कफ, अस्थमा, अपच, पेट से जुड़ी समस्याओं, मांसपेशियों में ऐंठन और अर्थराइटिस जैसी समस्या में राहत के लिए काफी मददगार होता है लेकिन देश में इसकी खेती न होने के कारण भारत अफगानिस्तान, ईरान और उज्बेकिस्तान से सालाना लगभग 1200 टन कच्ची हींग आयात करता है और इसके लिए प्रति वर्ष लगभग 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च करता है|

पहले पौधे को हिमाचल प्रदेश के लाहौल घाटी के क्वारिंग गांव में लगाया गया

बीते 15 अक्टूबर को देश का पहला हींग का पौधा CSIR-IHBT के डॉयरेक्टर डॉ. संजय कुमार के हाथों क्वारिंग गांव के एक किसान के खेत में रोपित किया गया| जिसके बाद हिमाचल प्रदेश में समुद्रतल से करीब 11 हजार फीट की ऊंचाई पर लाहौल घाटी में पहली बार हींग (Asafoetida) की खेती शुरू की गयी है|

इसके लिए अफगानिस्तान से लाए गए कच्ची हींग के बीज का पालमपुर स्थित इंस्टीच्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी (IHBT-Institute of Himalayan Bioresource Technology) की लैब में वैज्ञानिक तरीके से पौधा तैयार किया गया| IHBT पालमपुर के प्रयासों के कारण लाहौल घाटी के किसानों के खेती के तरीकों में ऐतिहासिक बदलाव आया है| इस बदलाव के तहत किसानों ने बंजर पड़ी जमीन का सदुपयोग करने के उद्देश्य से अब हींग की खेती को अपनाया है|

क्या अड़चन आ रही थी अब तक

सीएसआईआर के डायरेक्टर जनरल डॉ. शेखर मांडे ने बताया कि हींग उगाने के लिए 2016 से ही रिसर्च की जा रही है| 2016 से पहले भी कई प्रयास किये गए लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगी लेकिन कई सालों में यह पहला सफल प्रयास है| बता दें हींग की खेती भारत में इसलिए नहीं की जाती थी क्योंकि हींग सिर्फ लद्दाख और लाहौल स्पीति जैसी ठंडी जगहों पर पैदा होती है और इसके लिए कुछ और भौगौलिक परिस्थितियों का ध्यान रखना होता है| साथ ही भारत में शुरू हुई हींग की खेती में फेरुला अस्सा-फोटिडा की रोपण सामग्री का अभाव इस फसल की खेती में एक बड़ी अड़चन थी जिसके लिए IHBT हींग के बीज लाए और इसकी कृषि-तकनीक को विकसित किया|

इसके आलावा यह भी बताया गया है कि बीज से अंकुरित होने की दर केवल एक फीसदी है, जिसका मतलब 100 बीज होने पर उसमें से केवल एक के पौधा के रूप में तब्दील हो रहा है| ऐसे में अब देखना यह की इस बार हमें कितना सफलता मिलती है|

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